वो मेरी मज़बूरी है जान ! (पहला भाग)

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Pic Courtesy: mirror.co.uk
थकी थकी , उनींदी, बोझल आँखों के साथ उसने गली में खुलने वाले दरवाज़े पर लटका ताला खोला। देर बहुत हो चुकी थी। यूँ भी इतनी रात को, सामने वाला दरवाज़ा खुलवाना गरम पतीले को हथेली में लेने जैसा था।
फ़िक्र तो उसकी किसे ही थी , हाँ फिक्रनामो का शोर इस पहर भी उठता अगर वो किसी को जगाती। दबे पांव उसने कमरे में आकर बैग रखा और भूख प्यास के अहसास को खत्म करके नींद की गोद में जाने की तलब से किचिन में आकर फ्रिज खोला।
ठन्डे फ्रिज में दूध का पतीला भरा हुआ
था ,फिर भी दूध की कमी का रोना रोते हुए उसने अकसर माँ को सुना था। दूध उसे पसंद था बचपन से मगर बदकिस्मती का करिश्मा ही था कि बचपना खत्म होते ही बचपन की निशानियां भी खत्म हो गईं। उसे दूध का गिलास थमाने वाले हाथ लकड़ियों के साथ जल चुके थे।
सामने चूल्हा जल रहा था और उसने आधा कप दूध निकाल कर उसमें डेढ़ कप पानी मिला कर उसपर चाय चढ़ा दी। रात के इस पहर , वह , अपने घर में , दूध की बनी चाय बिना तानों के पी सकती थी। ये एहसास ही मौसम की उमस को कम कर गया। थोड़ा तलाश करने पर कार्टून भर के मंगाए गए बिस्किट का कनस्तर भी उसकी आँखों के सामने था ।
अफ़सोस ,पानी बन कर उसकी आँख की कोर से बह चला, जिसे उसने सूट के बाजू से रगड़ कर पोछ लिया। कनस्तर को ज्यों का त्यों बन्द कर के, कप लिए कमरे में कुछ देर पहले चलाए गए पुराने कूलर के सामने बैठ गई।
बगल वाले कमरे से कूलर की बूढी गिड़गिड़ाती आवाज़ नही आ रही थी वहाँ ठंडा सुकून बख्श गुलाबी धुंधलका फैला हुआ था , जिसके आगोश में माँ, और रेखा मौसी लेटे हुए थे।
आंखें मूंदने को ही थी कि शुभम की कॉल आ गई । इस वक्त उसका कॉल आना उसे सिवाय नींद में खलल के कुछ और नही लगा। पर ये था भी तो शुभम, कैसे उसकी कॉल अनदेखा करती। थकान और नींद की शिद्दत के बावजूद वो गौर से उसकी बेताबियों को सुन रही थी। एक लंबी बातचीत के बाद नींद की परी ने आखिर उसे बाहों में समेट ही लिया।
शुक्र था, अगले दिन इतवार था, और लंबी दोपहर में से कुछ पल वो अपनी आँखों के आराम को बख्श सकती थी।
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दरवाजे पर पड़ती जोरदार और लगातार आवाज़ों ने उसकी नींद का ताल्लुक आँखों से खत्म किया और वो टाँगे घसीटती हुई दरवाजे तक आई। दरवाज़ा खुलते ही माँ का लहज़ा उससे टकराया ," महीने में आठ हज़ार ही कमाती हो, नखरे तुम्हारे महारानियों वाले हैं , कम से कम इतवार को तो हाथ बंटा लिया करो। तुम कोई सोलह साल की कली नही हो , घर बस जाता तो अब तक खुद माँ बन गई होतीं।"-- लफ्ज़ बेशक पुराने थे, आये दिन ममता की मूरत कही जाने वाली माँ उसे ऐसे ही नवाजती थी।ममता और माँ दो अलग शब्द थे उसके लिए ।

सुन कर खामोशी से हर लफ्ज़ को अंदर उतार लेती थी मगर शुभम के आने के बाद ,ये लफ्ज़ तकलीफ देने लगे थे। आज भी उसे शिद्दत से अहसास हुआ उस सुबह की गैरमौजूदगी का जो शुभम के घर में होती होगी।

गोरे भरे भरे जिस्म पर फिरोज़ी साडी बांधे माँ खूबसूरत औरत लग रही थीं। उनकी रंगत से नज़र बचा कर अपने कुम्हलाए हाथों को हैरत से देखा उसने, और शुभम की मिठास भरी आवाज़ उसके कानों में गूंजी "," तुम बेहद खूबसूरत हो प्रतिमा" कहीं से भी वह खूबसूरत नही बाकी थी । शुभम ने तो उसे हर तरह से देखा है । उसकी संवलाई रंगत और शुभम की नज़रों के बीच झीना सा पर्दा भी बाकी नही था। अकेले हो जाने के डर ने प्रतिमा को दिलासा दिया की मोहब्बत की मोहताज नही होती ।
" मैं और रेखा इतवार बाजार जा रहे हैं । गोटे और बूटे लेने हैं , साड़ियों के कपडे ख़रीदे थे महीनो पहले ,"- माँ ने गालों पर पाउडर को रुमाल से एडजस्ट करते हुए कहा। उसने बेड पर पड़े साडी के पॉली बैग को देखा , जिसमे माँ की अलमारी में होने के बावजूद आधी शिकन तक नही थी।

"भई, तुम्हारे मज़े हैं प्रतिमा , तुम्हारी माँ ने तुम्हे खूब शहज़ादी बना रखा है , रात भर घर से गायब रहती हो , कहाँ जाती हो कहाँ नही , कोई सवाल नही करती मेरी ये बहन"- रेखा मौसी ने ब्लाउज के अंदर बनावटी पन को सही ढंग से एडजस्ट करते हुए उस पर सस्ती सी तोहमत उछाली।

पागलखाने में , जनाना सेल में बतौर चौकीदार काम करने वाली प्रतिमा बेहिस सी खड़ी रही उनके इस इलज़ाम पर। उसे अब दुःख या चुभन का अहसास नही हो रहा था क्योंकि कुछ महीनो में ही शुभम उसे ले जाएगा ब्याह कर।
खामोश पलटवार मुस्कान मौसी पर डाल कर वो किचिन में दाखिल हुई जहाँ नाश्ते के बर्तन, तरबूज और खरबूजे के छिलके और बीज खासे मलबे का सा मंजर बना रहे थे। चाय पीने की ख्वाहिशमंद होकर भी उसने किचिन को कम से कम नज़र भर देखने लायक बनाने की कोशिश में खुद को झोंक दिया।
अभी दोपहर का खाना और हफ्ते भर के कपडे भी उसके मुन्तज़िर थे। आने वाले दिनों में इस अजाब से छुटकारा मिलने की ख़ुशी ने उसे ढेरों ढेर काम के बावजूद थकने नही दिया। 

और मौसी के साथ माँ की भी वापसी हो गई।
"भई सोई ना हो तो ज़रा शिकंजी ही बना लो प्रतिमा , और तो तुमसे कोई उम्मीद कर ही नही सकते", -- ताम्बई रंग की हील में से भरे भरे पांव आज़ाद करते हुए माँ ने आवाज़ लगाई ।

मौसी को अब जरूरत नही थी। इसलिए बिना किसी बनावटीपन के उन्होंने ढीला ढाला कॉटन का कुर्ता पहन कर , जहां तहां अटके पाउडर वाले जिस्म को चटाई पे बिछा दिया।

किचिन में , गर्म हुई कानो की लवों के साथ प्रतिमा बेजान हो चुकी थी। फोन उसके हाथ से गिर चुका था । मगर उस औरत की आवाज अब भी गूँज रही थी।

"प्रतिमा , मैं शुभम की बीवी हूँ।, प्लीज़ मुझे बर्बाद मत करो , बहुत जल्द वो बाप बनाने वाला है ।-----
Story By : Anupam Verma

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