वो मेरी मज़बूरी है जान ! (दूसरा भाग)

दोस्तों ये हिंदी कहानी "वो मेरी मज़बूरी है जान !" का दूसरा भाग है अगर आपने अभी तक पहला भाग नही पढ़ा है तो आप यहाँ क्लिक >> वो मेरी मज़बूरी है जान ! (पहला भाग) पहला भाग पढ़ सकते है आगे की कहानी जारी :
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शुभम और प्रतिमा की मुलाक़ात चंद महीने पहले ही एक एक्सीडेंट के दौरान हुई थी। बुरी तरह जख्मी हुए शुभम को उसने ना सिर्फ अस्पताल पहुंचाया बल्कि उसके ठीक होने तक रोज़ , ड्यूटी से पहले उसे मिलने, उसकी खैरियत जानने बाकायदगी से जाने लगी थी। शुभम की पुरअसरार मौजूदगी ने प्रतिमा के अंदर ज़िन्दगी को लेकर खूबसूरत अहसास जगाने शुरू कर दिए । शुभम के ठीक हो जाने के बाद उनकी मुलाकातें अक्सर बाहर होती थीं।
रूखी , फीकी, बँटी और थकी सी ज़िन्दगी में शुभम की छुअन उसे जिंदगी के नर्म गोशों में ले जाती थी। दोनों ही एक दूसरे के बीच की कही अनकही का फर्क मिटाते जा रहे थे।
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"अब इतनी भी नाज़ुक नही है कि दो दिन बुखार आये और बन्दे का पांव ही पलंग से ना उतरे ", रेखा मौसी ने तवे पर रोटी डालते हुए बड़बडाहट जारी रखी। उनके लहज़े और हाव भाव में सुस्ती और काहिली दोनों ही घुले हुए थे। प्रतिमा की माँ खुद , किचिन में पांव रखने से अकसर बचती थीं ।
प्रतिमा बुखार से तपता हुआ बुत बनी अपने कमरे में कैद थी। कैद ही शायद उसका नसीबी थी। आसमानों के शहर में बसने वाले उसके परिंदे से सपने अपने पर खो चुके थे। वो फिर से , एक बार, अपनी तकलीफों भरी जिंदगी और नाम के अपनों के बीच अकेली थी। पर सवाल उसका साथ छोड़ने को हरगिज़ तैयार नही थे। मोहब्बत के बेलिबास तबादले आज उसे तौहीन लग रहे थे। शुभम की मासुमियत उसे आज दरिंदे की सी लग रही थी।
साकित जहन के साथ उसने मोबाइल उठाया और शुभम का नंबर डायल करते हुए कमरे का दरवाजा बंद कर लिया।
बाहर मुंह बिसूरती माँ और मौसी टिंडे और दाल में स्वाद तलाशते हुए खाने की थाली के साथ पूरा इन्साफ कर रही थीं , घर का लगभग सारा काम हो चुका था , प्रतिमा की जरूरत घर को एक नौकरानी और कमाऊ शख्स की तरह थी, और वो फिलहाल इन दोनों सूरतों का मुकाबला करने की कैफियत में ना थी।
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शायद शुभम को अल्फाज़ो से खेलना और अपनी मीठी आवाज़ का सही इस्तेमाल करना आता था, या शायद फोन पर जो लड़की खुद को उसकी बीवी बता रही थी वो महज़ एक घटिया मज़ाक था।
हकीकत जो भी रही हो , हालिया सूरत ये थी कि प्रतिमा का कच्ची हल्दी जैसा रंग उस फोन कॉल के बाद अपने हिस्से का निखार उसके चेहरे पर छोड़ गया।
दो एक दिन में उसने फिर ड्यूटी ज्वाइन कर ली और शुभम से मुलाकातों का सिलसिला फिर आम हो चला। पर वो मुलाकातें पार्क और रेस्टोरेंट तक ही रहीं।प्रतिमा अब सिर्फ शादी का इंतज़ार लिए बैठी थी।
इंतज़ार पहले जैसा था और प्रतिमा की घर में हैसियत भी पहले जैसी ही थी।
हर रोज ट्रांस की कैफियत में घर के सारे काम निपटाती।
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उसकी सोच का सिरा भटक के उसके गांव की गलियों के बीच अक्सर आ खड़ा होता था। जहां उसका दधिहाल था। उसकी अपनी बसाई यादें थीं।
हरी हरी पत्तियों के बोझ से झुके शीशम और नीम के पेड़ और उड़ते हुए पतंगे जिन्हें अकसर वो पकड़ने दौड़ा करती थी। उनकी पूंछ में धागा बाँध कर उड़ाने की ख्वाहिश भी कितनी बेदर्द थी, इसका अहसास बचपने में कहाँ था उसे ?
पूरनमासी की रात गांव कैसा चमकीला सा हो उठता था। और वो अकेले ही , गांव किनारे की बगिया में लगे हरसिंगार के पेड़ के इर्द गिर्द नाचने चली जाती थी।
बगिया की मेड पर बैठ के , ठंडी रेत के चमकीले रेजे टकटकी लगाए आशिक नज़रो से तका करती थी ।
गांव में बहू की हैसियत वाली उसकी माँ अकसर उसे डराते हुए चेताने की कोशिश किया करती थी "-वहाँ रात को ना जाया कर बिट्टी , रात को भूत लड़कियों को खाने आते हैं। और तब से , अकसर भूत की तलाश में, प्रतिमा , सोते हुए गांव में सूखे पत्तों पर नाच कर उस ना दिखने वाले भूत को चुनौती सी दिया करती थी।
माँ ठीक कहती थी। भूत प्रेत होते हैं।
एक रात ,जब सोंधी मिटटी से उसकी खुशबु के बदले अपनी सारी गुड़ियाओं का सौदा तय करने में उसकी नन्ही हथेलियां मसरूफ थीं तो भूत ने वार कर दिया।
उस रात माँ का कहा सच हुआ । भूत सच में रात को लड़कियों को खाने आते हैं।
अगला दिन नहूसत भरा था। हर घर में प्रतिमा को कोसने मिल रहे थे। गांव भर में अदहन का धुंआ था पर आग प्रतिमा के नसीब को सुलगाई गई थी।
उसकी टाँगों में लगे खून के चकत्ते धो कर माँ ने बड़ी कोशिश से साड़ी पहना दी। उसके दर्द को हथियार बना कर गांव भर की बड़ी बुढियों ने एक साथ हुंकारा भरा था फेरों के बाद "-प्रभु ने लाज राख ली, वो तो लड़का भला है जो हामी भर दी, वरना कौन चोरी कुबूल करे आजके जमाने में ",।
पड़ोस की अंजनी ताई ने पीछे कमर में नोचा था फुसफुसाते हुए ,"पांव छू ले बिट्टी, अब तो जो है यही है।" और उसने पांव छू लिए थे अपने उन नर्म पोरों से जो रात से अपना दर्द रो रहे थे।
दुनिया दारी समझने वाली औरतों ने एक रात पहले की घटना को सामने रख के विदाई टाल दी थी।
मगर , उसके पापा की मौत नहीं टल सकी थी , जो खुद उसने उन्हें दी थी।

" हाँ, मैं जानती हूँ , और अब कोई गुंजाइश नही दोबारा सोचने की , बस तुम सोच लो, क्योंकि मुझे तुम्हारी फ़िक्र खुद से ज्यादा है", प्रतिमा ने फैसलाकुन लहज़े में फोन पर अपनी बात जारी रखी। घर के काम वो निबटा चुकी थी और शिफ्ट अब भी नाइट की ही थी तो उसके पास अपने मनसूबे को अंजाम देने के लिए वक्त था।
कासनी रंग का , शुभम का ही दिया हुआ सूट पहन कर कमरे से निकली ही थी कि माँ ने चुभता हुआ टहूका दिया ,"सब खबर है मुझे, ये जो तुमने इतने रंग ढंग फैलाये हैं, सब समझ दिख रहा है,"-माँ के तल्ख लहज़े पर प्रतिमा ने खामोशी से होंठ भींच लिए। उसके लिए ये सालों से चला आ रहा सिलसिला था।
उसकी खामोशी को अपनी बेइज़्ज़ती समझ कर माँ ने उसे उसे कंधों से पकड़ कर झिंझोड़ा ," तुम्हे यही करना था तो तुम्हारा पति बुरा नही था प्रतिमा " आंसू उगलती आँखे माँ की आँखों पर बरस पड़ीं ," -" मैंने कोई गुनाह नही किया माँ, गुनाह आपने किया , मेरे साथ, जिसने मेरा बचपना इतनी दरिंदगी से कुचला आपने उसे मेरा मालिक बन जाने दिया, अच्छा हुआ विदा से पहले उसकी हमउम्र बीवी वापस आ गई वरना सिंदूर के दम पर मेरा नन्हा जिस्म रोज कुचला जाता, अच्छा हुआ। वो बुरा था माँ, तुम उससे ज्यादा बुरी थीं। तुम कैसे इतनी क्रूर हो गईं माँ ? उसकी आँखे सवाल बनी माँ के चहरे से घूमती हुई फर्श पर टिक गईं जहाँ उसके आंसुओ की गर्मी पानी की शक्ल में बरामद हुई।
मशीनी अंदाज में अब भी प्रतिमा के होंठ फड़फड़ा रहे थे , माँ सफ़ेद पड़ते उसके चेहरे को गमगीन आँखों से देख रही थीं। उसका गुस्सा अब नपे तुले लफ़्ज़ों की शक्ल में बरामदे की दीवारों से टकरा रहा था । हथेली की पुश्त से पसीना पोछते हुए फिर माँ की तरफ चौंक कर पलटी," तुम तो नसीब में यकीन करती हो ना मानती हो ना नसीब ?कोसती हो ना मेरे नसीब को तो फिर पापा की मौत को मेरे माथे मड़ते वक्त क्यों इतनी मौकापरस्त हो जाती हो? उसे भी नसीब समझ कर क्यों एक बार भी मुझे कलेजे से नही लगाया? कितना तरसी हूँ हर उस पल में जब मेरी उम्र की लड़कियां अपने नाज भरे किस्से सुनाया करती थीं , मैंने पापा को नही मारा माँ , उन्होंने जहर खुद खाया था।
"कितनी दोगली हो माँ, अफ़सोस भरी निराशा से एक बार फिर थकान उसके वजूद में उतर आयी। " बेटी का बलात्कार ये समाज इज़्ज़त के तराजू में तौलता है , इससे वाकिफ हो, मगर इस बात से अंजान हो कि ये समाज बेइज़्ज़त और शादी के बाद घर बैठी हुई लड़की के बाप को भी नहीं जीने देता।
सर्द होती माँ के पाँव के पास बैठ कर ,आज पहली बार एक औरत होने की हैसियत से सवाल किया ," क्या तुम नही जानती थीं कि तुम्हारे पति को तुम्हारा साथ चाहिए था उस बेइज़्ज़ती से उबरने के लिए "??
"पापा को समाज ने मारा माँ, मैंने नही। "-ठोस और मजबूत लहजे में उसने माँ के पीले पड़ते चहरे को थपथपाया।
रिवायत और थोपी जाने वाली मान्यताओं के प्रति उसके अंदर बेहिसी और बेलिहाजी जाग रही थी।
"मुझे बेहद जरूरी काम है माँ, सोचना अगर सोच सको तो कि किसने किसे छला है अब तक ,"-जाते हुए उसके कदमो की आहट के बाद, उसकी माँ का वजूद पिघल कर रह गया। सच तो ये था कि वो प्रतिमा को अनचाहे ही जन्म दे बैठी थी। उसकी तरफ कभी पूरी तरह झुक ही नही पाई। पति की मौत ने , सुहागन का दर्जा छीना मगर बेआसरा नही हुई प्रतिमा के होते। उसने हमेशा उसे अजीयतें ही दीं रेखा की दिन रात की बातों के सहर में कैद होकर।
वो इंसान थी कमजोर , माँ के नाम से पहचानी जाने वाली। पर आज शायद इंसान , अपना ही होना गलत साबित करने लगा था। माँ को एक बेटी बिना जचगी के जन्म देकर चली गई थी।
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" तुम , जानती हो ना कि ये सब बेहद मुश्किल होने वाला है तुम्हारे लिए ," - ममता भरी नज़रो से उसने रुचिका को देखा।
मुस्कुराती हुई रुचिका ने प्रतिमा की हथेली को चूम कर उसे दिलासा दिया।
"मैं, बीवी से ज्यादा एक औरत हूँ प्रतिमा , जिसका मान उसके पति ने तोड़ा। उस रात मैंने अपने कानों से सुना था शुभम के गलीज लफ्जों को जब उसने तुम्हे कहा था ,"#वो_मेरी_मजबूरी_है_जान, , उस रोज़, मेरे पांव से जमीं और सर से छत छिन जाती अगर मैं उसके मोबाइल से तुम्हार नंबर नही लेती। उसकी नज़रों में सखावत और दुलार छलक आया।
जूस् का गिलास प्रतिमा की और बढ़ाती रुचिका ने अफ़सोस भरे लहजे में शादीशुदा जिंदगी के परदे अपनी सौतन के सामने उघाड़ दिए।
"देखो ,मजबूरी को जताने के कितने इंतज़ाम इस गद्दे के नीचे खरीद कर रखे गए हैं, इसी बिस्तर पर खुशी खुशी मज़बूरियों के तकाजों का तबादला हुआ " फैसला कर लेने के बाद वो सहज थी। उसने गद्दा फिर से ज्यों का त्यों डाल कर अलमारी खोली, तमाम शोख रंग के झीने लिबास प्रतिमा को बेदर्दी से छले जाने का अहसास दिला रहे थे।
" ओह,मेरी जान , क्यों इतना काम करती हो तुम,-"शुभम की नज़रें बिस्तर पर बेतरतीब पड़े लिबासों पर थी और कदम रुचिका की ओर बाहें फैलाए बढ़ रहे थे। मगर उसके चेहरे के जाविए बदल गए प्रतिमा की शक्ल देख कर।
" शुभम , कितने मजबूर रहे हो तुम रुचिका के साथ, अभी अभी देखा।"-मखौल और बदलिहाजी से प्रतिमा के होंठ मुस्कुराये।
" थोड़ा सब्र कर लेते, ऐसी सिचुएशन में रातें सिर्फ सोकर भी गुजारी जा सकती हैं , अगर आप मर्दानगी निगल कर उसके लिफ़ाफ़े डस्टबिन में ना फेंकते।आपने प्रतिमा का इस्तेमाल किया है शुभम, वैसे मुझे भी ये लड़की पसंद है। आपको इस बच्चे की फ़िक्र करने की जरूरत नही। मैं और प्रतिमा इसके माँ बाप बन जाएंगे, उसके हाथ लगातार अपना सामान समेट रहे थे।
तभी अचानक, सिंदूर की डिबिया उसकी हथेली में रखते हुए प्रतिमा मुस्कुराई," आप जैसे मर्द मजबूरी के बिना नही जी सकते , लीजिये , नई मजबूरी तलाशिये, क्योंकि समाज में आप जैसे मजबूर मर्द और पतिव्रता औरतों की तादाद बेशुमार है।"
कुछ देर बाद प्रतिमा और रुचिका एक दूसरे का हाथ थामे बाहर निकल चुकी थीं। रुचिका के हाथ अपने हाड मांस से सींची कोख पर था और प्रतिमा के हाथ में रुचिका के कपड़ो की अटैची -----------

Story By: 
Anupam Verma
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