हिंदी कहानी : मुक्ति

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Mukti

वृंदावन .... भगवान श्री कृष्णा की लीला स्थली, गोपियों के साथ रासलीला करने वाले श्री कृष्णा की नगरी, कहते हैं श्री कृष्णा की प्रिय राधा का आशीर्वाद है इस नगरी को की कोई भी यहाँ भूखें पेट नहीं सोयेगा, इसीलिये यहाँ के वातावरण मे राधे राधे का संबोधन हमेशा गुंजायमान रहता है, यहाँ घरों से ज्यादा मंदिर हैं.. भगवान श्री कृष्णा और राधा के, उसी राधा और कृष्णा की नगरी मे..... एक संकरी सी गली के एक छोटे से सीलन और बदबूदार कमरे से दो वृद्ध महिलायें... उम्र होगी कोई सत्तर बहत्तर के करीब... सफ़ेद पुरानी धोती पहने... झुर्रियों वाले चेहरे पर नाक से लेकर माथे तक सफ़ेद चन्दन का टीका लगाये..... हाँथ मे लाठी लिये... कंधे पर झोली लटकाये… जून की चिलचिलाती आग बरसाती दोपहरी मे नंगे पैर तेज़ी से अपनी मंज़िल की तरफ दौड़ी जा रही हैं, 

" अरे ममता तेज़ी से पैर चला... पहले ही तेरे कारण हमें देर हो गई है कहीँ ऐसा ना हो की वहाँ सारे टोकन बंट जाएँ और हम खाली हाँथ रह जाएँ... " एक वृद्धा ने दूसरी वृद्धा से कहा जिसका नाम शायद ममता था, ममता ने उसकी बात सुनकर सिर्फ हूँ की आवाज़ अपने गले से निकाली और अपने पैरों की गति तेज़ कर दी और साथ ही याद करने लगी की कैसे सारी रात अपने घर अपने परिवार अपने इकलौते पोते की याद मे सोई नहीं थी.... उसकी आँखों के सामने वो बीते पल एक चलचित्र की तरह चलने लगे थे.... कैसे उसके पति के मरने के बाद उसके इकलौते बेटे और बहू ने उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था... 

रूखी सूखी रोटी देना और वो भी एक समय... बात बात पर बेईज्जती करना.... और फिर एक दिन बेटे ने घर का दरवाज़ा उसके लिये बंद करते हुए कहा था " माँ तेरी बहू को तेरा यहाँ रहना अच्छा नहीं लगता इसलिये तू अपना कहीँ और इंतजाम कर ले "... वो अवाक् सी काफी देर तक अपने मुँह पर बंद दरवाज़े को देखती रही थी... उसे उम्मीद नहीं थी की जिसे उसने अपने खून से सींचा था.. वही उसका अपना खून उसे इस तरह से अपने ही घर से यूँ बेइज्जत करके बाहर कर देगा.... 

वो सारी रात घर की चौखट पर बैठी रोती रही थी फिर भोर होने से पहले ही वहाँ से चल दी थी... वो नहीं चाहती थी की गाँव वालों को कुछ पता चले और उसके पति और उसके नाम की बदनामी हो की इन्होंने कैसे संस्कार अपनी औलाद को दिये जिसने अपनी विधवा माँ को घर से निकाल दिया... वो चुपचाप वृंदावन जाने वाली ट्रेन मे बैठ गई थी... उसने सुन रखा था किसी से की राधा कृष्ण की नगरी उस जैसी निराश्रय विधवाओं की आश्रयस्थली है... 

और फिर ये सब सोचते सोचते उसकी कब आँख लगी उसे पता ही ना चला, सुबह जब दिन चढ़े उमा ने उसे झिंझोड़ कर ये कहते हुए उठाया की " क्या तुझे आज मंदिर नहीं जाना भजन करने " तब उसकी आँख खुलीं थीं और वो हड़बड़ा कर उठ बैठी थी... लेकिन सारी रात रोने और जागने के कारण उसकी हिम्मत जवाब दे रही थी इसलिये उसने उमा से दोपहर के भजन मे चलने को कह कर उसे अकेले जाने को कह दिया था और फिर वो दोबारा से अपनी पुरानी कड़वी यादों मे खो गई थी.... 

वो याद करने लगी की कैसे तीन साल पहले वो अपनी सारी जमा पूँजी इकठ्ठा करके जो उसने मंदिरों मे भजन गा कर और भीख मांग कर जोड़ी थी उसे ले कर अपने गाँव गई थी इस उम्म्मीद से की बहू बेटे रुपये के लालच मे शायद उसे घर मे रहने दें... इसी बहाने कम से कम उसका अंतिम समय अपने घर मे पोते के साथ खेलते हुए कट जाता.. लेकिन बहू बेटे ने पास के रूपए ख़त्म होते ही फिर से उसे घर से निकाल दिया था...और कहा था कि " जब फिर से रुपये इकठ्ठे जो जायें तो आ जाना अपने पोते से मिलने ", वो बहुत गिड़गिड़ाई थी उनके सामने लेकिन उन लोगों के दिल तो पत्थर के हो चुके थे... वो फिर से आ गई थी अपने कान्हा के पास उनकी शरण मे... अब वो समझ चुकी थी की अगर उसे फिर से पोते का चेहरा देखना है तो उसे उन्हें इसका मूल्य चुकाना होगा.... इसीलिये उसने फिर से भजन और भीख से और एक समय फाका करके कुछ धन इकठ्ठा कर लिया था... बस एक दो दिन बाद वो फिर से गाँव जाने का मन बना चुकी थी... उसका पोता जो अब बड़ा हो गया होगा... अब तो पैरों से चलने लगा होगा और अब तो कुछ कुछ बोलने भी लगा होगा.... कितना अच्छा लगेगा ना जब वो अपनी तोतली जुबान से उसे दादी बुलायेगा... ये सब कुछ सोचते सोचते कब मंदिर आ गया उसे पता ही नहीं चला, वो यादों से तब बाहर आई जब उसे उमा ने टोका " अरे कहाँ खोई है ममता... चल जल्दी से लाइन मे लग जा नहीं तो टोकन ख़त्म हो जाएंगे ", टोकन मतलब चार रूपए.. दो तीन घंटे कान्हा के भजन के बदले उसे मिलते चार रुपये.…. इन्हीं चार चार रुपये की बूंदों से वो अपना पोते से मिलने का घड़ा भर लेना चाहती थी, 


टोकन बंट चुके थे, धक्कामुक्की और जद्दोजहद के बाद उमा और ममता ने भी जंग जीत ली थी.. उन्हें टोकन मिल गये थे, भजन शुरू हो चुका था, ममता सामने बाल रूप मे विराजमान कान्हा को एक टक निहारते हुए भजन गा रही थी.... उसे कान्हा की मूरत मे अपना पोता नज़र आ रहा था.. उसे ऐसा लग रहा था जैसे वो किलकारी लेता हुआ उसे पुकार रहा हो.... वो कान्हा और अपने पोते के मायाजाल मे ऐसी खोई की कब वो धड़ाम से नीचे गिर पड़ी और कब उसकी आत्मा परमात्मा से मिलने चली गई उसे पता ही ना चला, उसका निर्जीव शरीर फर्श पर पड़ा था, कुछ देर को भजन रुका.... 

फिर ममता के मृत शरीर को मंदिर के बाहर कूड़े के ढेर पर फेंक कर.. भजन फिर शुरू हो गया जैसे वहां कुछ हुआ ही ना हो, उमा की आँख मे आँसू और मुंह से भजन के स्वर निकल रहे थे.. पैरों मे मजबूरियों की बेड़ियाँ जो पड़ी थीं,

ममता कूड़े की गाड़ी से यमुना किनारे पहुँचा दी गई थी, उसका निर्जीव शरीर वहां पड़े कूड़े के बीच पड़ा था और ऊपर चील कव्वे उसे मुक्ति देने को आतुर थे,
 अब ममता को अपने परिवार से... अपने पोते से कहीँ मिलने जाने की जरूरत नहीं रह गई थी.... उसे मुक्ति जो मिल गई थी

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1 comments:

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HindIndia
admin
19 March, 2017 ×

बहुत ही बढ़िया article है ..... ऐसे ही लिखते रहिये और मार्गदर्शन करते रहिये ..... शेयर करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। :) :)

Congrats bro HindIndia you got PERTAMAX...! hehehehe...
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