"माँ" इस एक शब्द में पूरी दुनिया मेरी



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Happy Mother's Day
हाँ.. मैं ये सब मदर्स-फादर्स-वैलेंटाइन-फ्रेंडशिप डे में यकीन नहीं करता.. मैं बोल के बताना भी पसंद नहीं करता.. मेरा कोशिश होती है की लगाव जिनसे है, वो कहीं भी हों, मैं उनकी जिन्दगी में जैसे फिट हो सकता हूँ, हो जाऊं.. उनके लिए जरूरत पे उनका इमानदारी से साथ दे पाना ही मेरे प्यार का तरीका है..


पर इस बार जाने क्यूँ माँ के बारे में लिखने का मन है.. वजह ये है कि मैं उनसे कभी नहीं कह पाऊंगा.. हम दोनों इस मामले में अपंग हैं.. वो फेसबुक पे नहीं हैं इसीलिए और हिम्मत हो रही है की कह दूँ सब.. वरना एक दुसरे को लव वाला रिएक्शन दे के ही समझ-समझा जाते..



नेट चलाना नहीं आता उनको.. फेसबुक, मेल, ट्विटर कहीं भी कुछ दिखा दे तो कहेंगी की "हाँ, अंशु ने इन्टरनेट पे दिखाया था..", "आज नई फोटो लगाये हो इन्टरनेट पे..? अच्छी है..!", "तुम्हारी कविता पेपर में छपी, हम पढ़े.."
बस इतना ही एक्सप्रेशन.. शब्दों के सुदामा हैं हम दोनों.. बड़ी मेहनत से sms करना सीखा उन्होंने.. बर्थडे पे शादी में बिजी थीं और वो जानती हैं कि ये 12 बजे विश करने वाला टंटा पसंद नहीं मुझे तो सुबह sms किया.."Happy birthday amit"

रुआंसा होने से रोकूँ तो कैसे.. पहली बार जब घर छोड़ा, 2007 में.. तब कानपुर के होस्टल में बस उन्हीं को याद करके रोया.. कई दिन तक..

घर जाता हूँ तो आज भी उनके बगल में ही सोता हूँ.. मेरे ट्रेन + बस के टाइम जोड़ के हिसाब से मेरे मनपसन्द की चीज़ गरमागरम तैयार होती है..


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बोहोत मारा है मुझे.. बोहोत.. चाकू छोड़ के ऐसा कुछ नहीं था घर में जो उठाने लायक हो और उससे मारा न हो.. चप्पल, झाड़ू, करछुल, वाइपर... आज सोच सकता हूँ.. लिख सकता हूँ.. पढ़ सकता हूँ.. समझ सकता हूँ.. सब उसी का नतीजा है.. टीचर समुदाय से अपनी कभी नहीं बनी.. बोहोत कम गुरु लोग मिले जिनका सपोर्ट मिला.. पर कोई अफ़सोस नहीं.. खूब पढ़ाया घर पे ही.. नहीं पता तो पढ़ के पढ़ाया.. रटा जवाब देने पे दुगना मारा.. रोने पे और मारा.. पर कभी सेकंड नहीं आने दिया..

कभी मेरी सैलरी नहीं पूछी.. कभी कुछ माँगा नहीं.. (सिवाय महीने में टैरिफ और टॉकटाइम के रिचार्ज के  ) बस एक ही चीज़ चाहिए होती है..

की दिन में एक बार "हाँ सब ठीक है, अपना कहो" टाइप की ही.. बात हो जाए..
पापा चिढ़ाते हैं.. कि अमित बस अपनी माँ का बेटा है.. मेरा नहीं..

बोहोत बार चिल्ला देता हूँ.. कहीं की खीझ कहीं.. या उन्हीं की किसी हरकत पे.. कित्ता कोसा है खुद को हर बार, ये मैं ही जानता हूँ.. माफ़ी नहीं मांगता, वो पहले ही माफ़ कर देती हैं.. 9 साल से दूर हूँ.. कौन कहता है बस लडकियाँ विदा होती हैं... मैं भी विदा ही हुआ हूँ.. वो भी बचपने में ही.. साल में 2 बार मायके हो आता हूँ.. मेरी विदाई ऑफिसियल नहीं है तो लिपट के रोना अलाऊ नहीं है.. उम्मीद है शायद एक दिन फिर उनके साथ रहने को मिल पायेगा.. पहले जैसे.. आलू के पराठे वो भरेंगी.. मैं सेकुंगा.. फिर छत पे बैठ के बात करते-करते खायेंगे.. 4 अपने और 1 उनकी जिद के.. :-)


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POST BY: AMIT TIWARI

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